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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d9-d10
 
 
श्लोक  13.99.d9-d10 
विधिना धृतिमास्थाय शुश्रूषुरनहंकृत:।
वर्णत्रयस्यानुमतो यथाशक्ति यथाबलम्॥
कर्मणा मनसा वाचा चक्षुषा च चतुर्विधम्।
आस्थाय नियमं धीमान् शान्तो दान्तो जितेन्द्रिय:॥
 
 
अनुवाद
बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह क्रमबद्ध तरीके से धैर्य का सहारा ले, गुरुजनों की सेवा में तत्पर रहे, अहंकार रहित होकर तीनों वर्णों की सहानुभूति का पात्र बने तथा अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार कर्म, मन, वाणी और नेत्रों द्वारा चार प्रकार के संयम का सहारा लेकर शान्त, विनम्र और जितेन्द्रिय बने।
 
An intelligent person should take the help of patience in a systematic way, be ready to serve his teachers, be egoless and be worthy of the sympathy of the three varnas, and according to his strength and power, by taking support of the four types of restraint through action, mind, speech and eyes, he should become peaceful, submissive and Jitendriya.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)