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mahabharat 13.99.d88: शीत-ग्रीवा आदि सभी द्वैत स्वभाव से ही आते-जाते रहते हैं, सभी पदार्थ स्वभाव से ही उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं। सभी त्रिगुण पदार्थ समुद्र की लहरों के समान आते-जाते रहते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d88
 
 
श्लोक  13.99.d88 
स्वभावतो हि द्वन्द्वानि विप्रयान्त्युपयान्ति च।
स्वभावत: सर्वभावा भवन्ति न भवन्ति च॥
सागरस्योर्मिसदृशा विज्ञातव्या गुणात्मका:।
 
 
अनुवाद
शीत-ग्रीवा आदि सभी द्वैत स्वभाव से ही आते-जाते रहते हैं, सभी पदार्थ स्वभाव से ही उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं। सभी त्रिगुण पदार्थ समुद्र की लहरों के समान आते-जाते रहते हैं।
 
All the dualities like cold and hot etc. keep coming and going by nature, all the substances are created and destroyed by nature. All the triguna substances keep coming and going like the waves of the ocean.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)