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mahabharat 13.99.d77: शूद्र को सेवा करने से जो इच्छित उन्नति मिलती है, वह उन्नति उसे दान, व्रत आदि देने से भी नहीं मिल सकती।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d77
 
 
श्लोक  13.99.d77 
न तथा सम्प्रदानेन नोपवासादिभिस्तथा।
इष्टां गतिमवाप्नोति यथा शुश्रूषकर्मणा॥
 
 
अनुवाद
शूद्र को सेवा करने से जो इच्छित उन्नति मिलती है, वह उन्नति उसे दान, व्रत आदि देने से भी नहीं मिल सकती।
 
The desired progress that a Shudra gets by doing service, he cannot get that progress even by giving charity, fasting etc.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)