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mahabharat 13.99.d52: जो इसके विपरीत करता है, वह मानव कल्याण का पात्र नहीं होता, इसलिए शूद्र को सदैव तपस्वियों की सेवा करके अपना कल्याण करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d52
 
 
श्लोक  13.99.d52 
अतोऽन्यथा तु कुर्वाण: श्रेयो नाप्नोति मानव:।
तस्माद् भिक्षुषु शूद्रेण कार्यमात्महितं सदा॥
 
 
अनुवाद
जो इसके विपरीत करता है, वह मानव कल्याण का पात्र नहीं होता, इसलिए शूद्र को सदैव तपस्वियों की सेवा करके अपना कल्याण करना चाहिए।
 
One who does the opposite is not a beneficiary of human welfare, hence a Shudra should always do his own welfare by serving the ascetics.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)