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mahabharat 13.99.d44: क्षत्रिय वे हैं जो उत्साहपूर्वक यज्ञ करते हैं। वैश्यों के यज्ञ में हविष्य (आहुति देने वाली सामग्री) की प्रधानता होती है, शूद्रों का यज्ञ केवल सेवाभावी होता है और ब्राह्मण वे हैं जो जपरूपी यज्ञ करते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d44
 
 
श्लोक  13.99.d44 
क्षत्रा आरम्भयज्ञास्तु हविर्यज्ञा विश: स्मृता:।
शूद्रा: परिचारयज्ञा जपयज्ञास्तु ब्राह्मणा:॥
 
 
अनुवाद
क्षत्रिय वे हैं जो उत्साहपूर्वक यज्ञ करते हैं। वैश्यों के यज्ञ में हविष्य (आहुति देने वाली सामग्री) की प्रधानता होती है, शूद्रों का यज्ञ केवल सेवाभावी होता है और ब्राह्मण वे हैं जो जपरूपी यज्ञ करते हैं।
 
Kshatriyas are the ones who perform yagya with enthusiasm. In the yagya of Vaishyas, havishya (offering material) predominates, the yagya of Shudras is service only, and the Brahmins are the ones who perform yagya in the form of chanting.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)