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mahabharat 13.99.d128: इस शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्रेत और सोलहवाँ मन - ये सोलह विकार हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d128
 
 
श्लोक  13.99.d128 
पञ्च बुद्धीन्द्रियाणीह पञ्च कर्मेन्द्रियाण्यपि॥
पञ्च भूतविशेषाश्च मनश्चैव तु षोडश।
 
 
अनुवाद
इस शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्रेत और सोलहवाँ मन - ये सोलह विकार हैं।
 
In this body there are five sense organs, five action senses, five ghosts and the sixteenth mind – these are sixteen disorders.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)