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mahabharat 13.99.d121: मन और इन्द्रियों को वश में करके सदैव क्षमाशील और निर्दोष रहना चाहिए तथा गुरुजनों की सेवा करनी चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d121
 
 
श्लोक  13.99.d121 
उपशान्तेन दान्तेन क्षमायुक्तेन सर्वदा॥
शुश्रूषा प्रतिपत्तव्या नित्यमेवानसूयता।
 
 
अनुवाद
मन और इन्द्रियों को वश में करके सदैव क्षमाशील और निर्दोष रहना चाहिए तथा गुरुजनों की सेवा करनी चाहिए।
 
By controlling the mind and controlling the senses, one should always be forgiving and blameless and serve one's teachers.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)