Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.99.d117: जिस प्रकार एक शिष्य अपने गुरु का अपमान करता है, गुरु भी अपने शिष्यों के प्रति वैसा ही व्यवहार करते हैं। अर्थात्, शिष्य को उसके कर्मों के अनुसार ही फल मिलता है। जो शिष्य अपने गुरु का अपमान करता है, उसका वेद-शास्त्रों का अध्ययन व्यर्थ हो जाता है। उसका सारा ज्ञान अज्ञान में बदल जाता है। | mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यथावमन्येत गुरुं तथा तेषु प्रवर्तते।
व्यर्थमस्य श्रुतं भवति ज्ञानमज्ञानतां व्रजेत्॥
अनुवाद
जिस प्रकार एक शिष्य अपने गुरु का अपमान करता है, गुरु भी अपने शिष्यों के प्रति वैसा ही व्यवहार करते हैं। अर्थात्, शिष्य को उसके कर्मों के अनुसार ही फल मिलता है। जो शिष्य अपने गुरु का अपमान करता है, उसका वेद-शास्त्रों का अध्ययन व्यर्थ हो जाता है। उसका सारा ज्ञान अज्ञान में बदल जाता है।
The way a disciple insults his Guru, the Guru also behaves towards his disciples in the same way. That is, a disciple gets the result according to his deeds. The study of Vedas and scriptures done by a disciple who insults his Guru becomes useless. All his knowledge turns into ignorance.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥