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mahabharat 13.99.d116: ज्ञान या विज्ञान प्राप्त करने के बाद भी नकारात्मक सोच से मुक्त होकर गुरुजनों के प्रति पहले जैसी सद्भावना बनाए रखनी चाहिए। अथवा एकाग्र मन से पहले से भी अधिक भक्तिभाव रखना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d116
 
 
श्लोक  13.99.d116 
उपलभ्य तु विज्ञानं ज्ञानं वाप्यनसूयक:।
तथैव वर्तेद् गुरुषु भूयांसं वा समाहित:॥
 
 
अनुवाद
ज्ञान या विज्ञान प्राप्त करने के बाद भी नकारात्मक सोच से मुक्त होकर गुरुजनों के प्रति पहले जैसी सद्भावना बनाए रखनी चाहिए। अथवा एकाग्र मन से पहले से भी अधिक भक्तिभाव रखना चाहिए।
 
Even after acquiring knowledge or science, one should be free from negative thinking and maintain the same goodwill towards the teachers as before. Or, with a concentrated mind, one should have even more devotion than before.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)