श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 98: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानकी प्रशंसा  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  13.98.12 
एतस्य त्वपनीतस्य समाधिं तात चिन्तय।
यथा सुखगम: पन्था भवेत् त्वद्रश्मिभावित:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
पिता जी! इस समय आपने जो अपराध किया है, उसका कोई उपाय सोचिए, जिससे आपकी किरणों से तप्त हुए मार्ग पर सुगमतापूर्वक चला जा सके।॥12॥
 
Father! Think of a solution to the crime you have committed at this time, so that the path heated by your rays can be easily walked on.'॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)