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mahabharat 13.97.5: हे मनुष्यों के स्वामी! इन दोनों वस्तुओं का दान किस प्रकार अक्षय होता है और किस प्रकार ये पुण्यों की प्राप्ति कराने वाले माने गए हैं। मैं इन सब बातों का पूर्ण वर्णन करूँगा॥5॥   |   mahabharat अध्याय 13.97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 97: छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  13.97.5 
यथा चाक्षय्यतां प्राप्तं पुण्यतां च यथा गतम्।
सर्वमेतदशेषेण प्रवक्ष्यामि नराधिप॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! इन दोनों वस्तुओं का दान किस प्रकार अक्षय होता है और किस प्रकार ये पुण्यों की प्राप्ति कराने वाले माने गए हैं। मैं इन सब बातों का पूर्ण वर्णन करूँगा॥5॥
 
O lord of men! How the donation of these two things becomes everlasting and how they are considered to lead to attainment of virtues. I will describe all these things in full. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)