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mahabharat 13.96.40: मित्र ने कहा, 'जिसने आपका कमल हर लिया है, वह द्विज होकर भी प्रातः-सायं अग्निहोत्र की उपेक्षा करके सुखपूर्वक सोता है। संन्यासी होकर भी वह मनमाना आचरण करता है। अर्थात् वह उपर्युक्त पापों के फल का भागी है।'   |   mahabharat अध्याय 13.96: ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 96: ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस देना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  13.96.40 
शुन:सख उवाच
अग्निहोत्रमनादृत्य स सुखं स्वपतु द्विज:।
परिव्राट् कामवृत्तोऽस्तु यस्ते हरति पुष्करम्॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
मित्र ने कहा, 'जिसने आपका कमल हर लिया है, वह द्विज होकर भी प्रातः-सायं अग्निहोत्र की उपेक्षा करके सुखपूर्वक सोता है। संन्यासी होकर भी वह मनमाना आचरण करता है। अर्थात् वह उपर्युक्त पापों के फल का भागी है।'
 
The friend said, 'The one who has taken away your lotus, in spite of being a twice born person, ignores the Agnihotra (fire sacrifice) in the morning and evening and sleeps comfortably. In spite of being a Sanyasi, he behaves arbitrarily. In other words, he is a sharer in the consequences of the above-mentioned sins.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)