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mahabharat 13.95.42: गौतम बोले, "इस संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो मनुष्य की आशाओं को तृप्त कर सके। मनुष्य की आशाएँ समुद्र के समान हैं, वे कभी भरती नहीं।" ॥42॥   |   mahabharat अध्याय 13.95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  13.95.42 
गौतम उवाच
न तल्लोके द्रव्यमस्ति यल्लोकं प्रतिपूरयेत्।
समुद्रकल्प: पुरुषो न कदाचन पूर्यते॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
गौतम बोले, "इस संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो मनुष्य की आशाओं को तृप्त कर सके। मनुष्य की आशाएँ समुद्र के समान हैं, वे कभी भरती नहीं।" ॥42॥
 
Gautama said, "There is no such thing in this world which can satisfy the hopes of a man. A man's hopes are like the ocean; they never get filled." ॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)