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भरद्वाज उवाच
उत्पन्नस्य रुरो: शृंगं वर्धमानस्य वर्धते।
प्रार्थना पुरुषस्येव तस्य मात्रा न विद्यते॥ ४१॥
अनुवाद
भारद्वाज ने कहा, 'जिस प्रकार हिरण का सींग जन्म के साथ बढ़ता रहता है, उसी प्रकार मनुष्य का लोभ भी बढ़ता रहता है, इसकी कोई सीमा नहीं है।
Bharadwaj said, 'Just as the horn of a deer keeps on growing as it is born, similarly the greed of a human being keeps on increasing, there is no limit to it.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥