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mahabharat 13.95.33: राजा द्वारा दिया गया दान ब्राह्मण के एक दिन के सारे तप को नष्ट कर देता है, जैसे दावानल जंगल को जला देता है।   |   mahabharat अध्याय 13.95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  13.95.33 
अह्नापहि तपो जातु ब्राह्मणस्योपजायते।
तद् दाव इव निर्दह्यात् प्राप्तो राजप्रतिग्रह:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
राजा द्वारा दिया गया दान ब्राह्मण के एक दिन के सारे तप को नष्ट कर देता है, जैसे दावानल जंगल को जला देता है।
 
The charity given by a king destroys all the penance a Brahmin accumulates in a day, like a forest fire that burns down a forest.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)