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mahabharat 13.95.19: भीष्मजी बोले - राजन ! जो ब्राह्मण साधु अर्थात् अच्छे आचरण वाले से और असाधु अर्थात् बुरे गुणों और बुरे आचरण वाले से दान लेते हैं, उनमें से अच्छे गुणों और अच्छे आचरण वाले से दान लेने में कम दोष लगता है। परन्तु जो बुरे गुणों और बुरे आचरण वाले से दान लेता है, वह पाप में डूब जाता है ॥19॥   |   mahabharat अध्याय 13.95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  13.95.19 
भीष्म उवाच
साधोर्य: प्रतिगृह्णीयात् तथैवासाधुतो द्विज:।
गुणवत्यल्पदोष: स्यान्निर्गुणे तु निमज्जति॥ १९॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी बोले - राजन ! जो ब्राह्मण साधु अर्थात् अच्छे आचरण वाले से और असाधु अर्थात् बुरे गुणों और बुरे आचरण वाले से दान लेते हैं, उनमें से अच्छे गुणों और अच्छे आचरण वाले से दान लेने में कम दोष लगता है। परन्तु जो बुरे गुणों और बुरे आचरण वाले से दान लेता है, वह पाप में डूब जाता है ॥19॥
 
Bhishmaji said – King! Among the Brahmins who accept donations from a Sadhu i.e. a person with good conduct and from an Asadhu i.e. a person with bad qualities and bad conduct, there is less fault in accepting donations from a person with good virtues and conduct. But the one who accepts charity from someone with bad qualities and misconduct sinks into sin. 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)