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mahabharat 13.95.125: जो मृणालों का अपहरण करता है, वह अपवित्र होने, वेदों को मिथ्या मानने, धन का अभिमान करने, ब्राह्मण होकर भी खेत जोतने और दूसरों से ईर्ष्या करने आदि पापों का दोषी होगा ॥125॥   |   mahabharat अध्याय 13.95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 125
 
 
श्लोक  13.95.125 
अशुचिर्ब्रह्मकूटोऽस्तु ऋद्धॺा चैवाप्यहंकृत:।
कर्षको मत्सरी चास्तु बिसस्तैन्यं करोति य:॥ १२५॥
 
 
अनुवाद
जो मृणालों का अपहरण करता है, वह अपवित्र होने, वेदों को मिथ्या मानने, धन का अभिमान करने, ब्राह्मण होकर भी खेत जोतने और दूसरों से ईर्ष्या करने आदि पापों का दोषी होगा ॥125॥
 
He who abducted the Mrinals would be guilty of the sins of being impure, of believing the Vedas to be false, of being proud of one's wealth, of tilling a field despite being a Brahmin, and of being jealous of others. ॥125॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)