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mahabharat 13.95.121: जिसने मृणाल चुराई है, वह सबसे द्वेष करने वाला, अपनी स्त्री की कमाई पर निर्वाह करने वाला, भाई-बंधुओं से अलग रहने वाला, सबसे द्वेष रखने वाला तथा एक-दूसरे के घर अतिथि होने वाला पापी होगा॥121॥   |   mahabharat अध्याय 13.95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  13.95.121 
द्वेष्यो भार्योपजीवी स्याद् दूरबन्धुश्च वैरवान्।
अन्योन्यस्यातिथिश्चास्तु बिसस्तैन्यं करोति य:॥ १२१॥
 
 
अनुवाद
जिसने मृणाल चुराई है, वह सबसे द्वेष करने वाला, अपनी स्त्री की कमाई पर निर्वाह करने वाला, भाई-बंधुओं से अलग रहने वाला, सबसे द्वेष रखने वाला तथा एक-दूसरे के घर अतिथि होने वाला पापी होगा॥121॥
 
He who has stolen the Mrinal will be guilty of hating everyone, living off the earnings of his wife, staying away from brothers and relatives, being hostile to everyone and being a guest at each other's homes.॥ 121॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)