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mahabharat 13.95.105: ऐसा कहकर संन्यासी ने अपने ब्रह्मदण्ड के समान त्रिदण्ड से उसके सिर पर इतनी जोर से प्रहार किया कि यातुधानी पृथ्वी पर गिर पड़ी और तुरन्त ही भस्म हो गई।   |   mahabharat अध्याय 13.95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  13.95.105 
सा ब्रह्मदण्डकल्पेन तेन मूर्ध्नि हता तदा।
कृत्या पपात मेदिन्यां भस्म सा च जगाम ह॥ १०५॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर संन्यासी ने अपने ब्रह्मदण्ड के समान त्रिदण्ड से उसके सिर पर इतनी जोर से प्रहार किया कि यातुधानी पृथ्वी पर गिर पड़ी और तुरन्त ही भस्म हो गई।
 
Saying this the Sanyasi struck her head with his tridanda, which was similar to the Brahmadanda, so hard that the Yaatudhaani fell down on the earth and was instantly reduced to ashes.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)