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mahabharat 13.95.103: यातुधानि ने कहा, "विप्रवर! आपने अपना नाम अस्पष्ट रूप से बताया है। अतः अब कृपया अपना नाम स्पष्ट रूप से बताइये।" 103.   |   mahabharat अध्याय 13.95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  13.95.103 
यातुधान्युवाच
नामनैरुक्तमेतत् ते वाक्यं संदिग्धया गिरा।
तस्मात् पुनरिदानीं त्वं ब्रूहि यन्नाम ते द्विज॥ १०३॥
 
 
अनुवाद
यातुधानि ने कहा, "विप्रवर! आपने अपना नाम अस्पष्ट रूप से बताया है। अतः अब कृपया अपना नाम स्पष्ट रूप से बताइये।" 103.
 
Yaatudhaani said, "Vipravara! You have mentioned your name in an ambiguous manner. So, please explain your name clearly now." 103.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)