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mahabharat 13.95.100: पशु सखा बोले - हे अग्नि से उत्पन्न प्राणी ! मैं पशुओं को प्रसन्न रखता हूँ और उनका प्रिय मित्र हूँ; इसी गुण के अनुसार मेरा नाम पशु सखा है ॥ 100॥   |   mahabharat अध्याय 13.95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  13.95.100 
पशुसख उवाच
पशून् रञ्जामि दृष्ट्वाहं पशूनां च सदा सखा।
गौणं पशुसखेत्येवं विद्धि मामग्निसम्भवे॥ १००॥
 
 
अनुवाद
पशु सखा बोले - हे अग्नि से उत्पन्न प्राणी ! मैं पशुओं को प्रसन्न रखता हूँ और उनका प्रिय मित्र हूँ; इसी गुण के अनुसार मेरा नाम पशु सखा है ॥ 100॥
 
Pasu Sakha said - O creature born from fire! I keep the animals happy and am their dear friend; according to this quality my name is Pasu Sakha.॥ 100॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)