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mahabharat 13.93.7: फिर शास्त्रविहित अनुष्ठानों द्वारा अपवित्रता दूर करने के पश्चात् वह पुत्र शोक में डूबकर अत्यंत दुःखी हो गया।   |   mahabharat अध्याय 13.93: शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 93: शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  13.93.7 
निमिस्तु कृत्वा शौचानि विधिदृष्टेन कर्मणा।
संतापमगमत् तीव्रं पुत्रशोकपरायण:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
फिर शास्त्रविहित अनुष्ठानों द्वारा अपवित्रता दूर करने के पश्चात् वह पुत्र शोक में डूबकर अत्यंत दुःखी हो गया।
 
Then after removing the impurity through rituals prescribed by the scriptures, he became extremely distressed, immersed in the grief for his son. 7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)