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mahabharat 13.9.17: हे पाण्डुपुत्र प्रजानाथ! मैंने भी भगवान श्रीकृष्ण के मुख से यही बात सुनी है; जब वे पहले ब्राह्मण को यही कथा सुना रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 13.9: ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके न देने तथा उसके धनका अपहरण करनेसे दोषकी प्राप्तिके विषयमें सियार और वानरके संवादका उल्लेख एवं ब्राह्मणोंको दान देनेकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 9: ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके न देने तथा उसके धनका अपहरण करनेसे दोषकी प्राप्तिके विषयमें सियार और वानरके संवादका उल्लेख एवं ब्राह्मणोंको दान देनेकी महिमा  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.9.17 
श्रुतश्चापि मया भूय: कृष्णस्यापि विशाम्पते।
कथां कथयत: पूर्वं ब्राह्मणं प्रति पाण्डव॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे पाण्डुपुत्र प्रजानाथ! मैंने भी भगवान श्रीकृष्ण के मुख से यही बात सुनी है; जब वे पहले ब्राह्मण को यही कथा सुना रहे थे।
 
Prajanath! O son of Pandu! I have also heard the same thing from the mouth of Lord Krishna; when he was narrating the same story to a Brahmin earlier.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)