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श्लोक 13.89.1  |
युधिष्ठिर उवाच
चातुर्वर्ण्यस्य धर्मात्मन् धर्मा: प्रोक्ता यथा त्वया।
तथैव मे श्राद्धविधिं कृत्स्नं प्रब्रूहि पार्थिव॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| युधिष्ठिर बोले - हे धर्मात्मान! पृथ्वीनाथ! जिस प्रकार आपने चारों वर्णों के लिए धर्म का वर्णन किया है, उसी प्रकार मेरे लिए श्राद्ध की विधि का वर्णन कीजिए॥1॥ |
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| Yudhishthira said - O Dharmatman! Prithvinath! Just as you have explained the Dharma for the four Varnas, in the same way please describe the method of Shraddha for me.॥ 1॥ |
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