श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  13.87.98 
यज्ञं पशुपते: प्रीता वरुणस्य महात्मन:।
स्वयम्भुवस्तु ता दृष्ट्वा रेत: समपतद् भुवि॥ ९८॥
 
 
अनुवाद
वे देवांगनाएँ महात्मा वरुण पशुपति के यज्ञ में आकर अत्यन्त प्रसन्न थीं। उस समय उन्हें देखकर स्वयंभू ब्रह्माजी का वीर्य स्खलित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥98॥
 
Those Devanganas were very happy to come to the Yagya of Mahatma Varun Pashupati. At that time, seeing them, the semen of Swayambhu Brahmaji ejaculated and fell on the earth. 98॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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