| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध » श्लोक 96-97 |
|
| | | | श्लोक 13.87.96-97  | तस्य यज्ञ: पशुपतेस्तप: क्रतव एव च।
दीक्षा दीप्तव्रता देवी दिशश्च सदिगीश्वरा:॥ ९६॥
देवपत्न्यश्च कन्याश्च देवानां चैव मातर:।
आजग्मु: सहितास्तत्र तदा भृगुकुलोद्वह॥ ९७॥ | | | | | | अनुवाद | | भृगुकुलभूषण! इस प्रकार भगवान पशुपति का यज्ञ चलने लगा। उसमें भाग लेने के लिए तप, क्रतु, उद्दीप्य व्रत की दीक्षा देवी, दिक्पालों सहित दिशाएँ, देव पत्नियाँ, देव कन्याएँ और देव माताएँ भी एकत्रित हुईं। 96-97॥ | | | | Bhrigukulbhushan! In this way the yagya of Lord Pashupati started going on. To participate in it, Tapa, Kratu, Diksha Devi of Uddipta Vrat, Dishas along with Dikpalas, deity wives, deity girls and deity mothers also came together. 96-97॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|