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mahabharat 13.87.93: हे प्रभु! पिनाकधारी महादेवजी ने अनेक रूपों से उस यज्ञ की शोभा बढ़ाई और स्वयं भी उसमें आहुति दी॥ 93॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  13.87.93 
संजुहावात्मनाऽऽत्मानं स्वयमेव तदा प्रभो।
यज्ञं च शोभयामास बहुरूपं पिनाकधृत्॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! पिनाकधारी महादेवजी ने अनेक रूपों से उस यज्ञ की शोभा बढ़ाई और स्वयं भी उसमें आहुति दी॥ 93॥
 
O Lord! Mahadeva, the bearer of Pinaka, enhanced the beauty of that yajna in his many forms and He Himself offered Himself as an offering.॥ 93॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)