श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 91
 
 
श्लोक  13.87.91 
लक्षणानि स्वरा: स्तोभा निरुक्तं सुरपङ्‍क्तय:।
ओङ्कारश्चावसन्नेत्रे निग्रहप्रग्रहौ तथा॥ ९१॥
 
 
अनुवाद
वेदोंके चिह्न, उत्तम स्वर, स्तोत्र, निरुक्त, सूर्पणक्ति, ओंकार तथा यज्ञके नेत्र, प्रग्रह और निग्रह भी उस स्थानपर स्थित थे ॥91॥
 
The symbols of the Vedas, sublime notes, stotras, nirukta, surpankti, omkar and eyes of yagya, Pragraha and Nigraha were also situated at that place. 91॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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