श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  13.87.9-10 
तद् वै सर्वानतिक्रम्य देवदानवराक्षसान्।
मानुषानथ गन्धर्वान् नागानथ च पक्षिण:॥ ९॥
अस्त्रेणामोघपातेन शक्त्या तं घातयिष्यति।
यतो वो भयमुत्पन्नं ये चान्ये सुरशत्रव:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
वे ही समस्त देवताओं, दानवों, राक्षसों, मनुष्यों, गन्धर्वों, नागों और पक्षियों को लांघकर अपने अमोघ अस्त्र के बल से उस राक्षस का वध करेंगे, जिसने तुम्हें भयभीत किया है। वे देवताओं के अन्य शत्रुओं का भी नाश करेंगे॥9-10॥
 
He alone will leap over all the gods, demons, monsters, men, Gandharvas, serpents and birds and with the power of his infallible weapon will kill the demon who has caused you fear. He will also destroy the other enemies of the gods.॥ 9-10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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