श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  13.87.85 
पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मंगलम्।
यत् सुवर्णं स भगवानग्निरीश: प्रजापति:॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
वह पवित्रतमों में भी पवित्र और मंगलों में भी परम मंगलमय है। जो स्वर्ण है, वह अग्निदेव के समान है, वह ईश्वर और प्रजापति के समान है ॥ 85॥
 
He is the holiest of the holiest and the most auspicious of the auspicious. He who is gold is the same as Lord Agni, he is the same as God and Prajapati. ॥ 85॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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