श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  13.87.82 
तत: स कार्तिकेयत्वमवाप परमद्युति:।
स्कन्नत्वात् स्कन्दतां चापि गुहावासाद् गुहोऽभवत्॥ ८२॥
 
 
अनुवाद
इसीलिए वह अत्यंत तेजस्वी पुत्र 'कार्तिकेय' नाम से विख्यात हुआ। शिव के संचित वीर्य से उत्पन्न होने के कारण उसका नाम 'स्कन्द' पड़ा और पर्वत की गुफा में निवास करने के कारण उसका नाम 'गुह' पड़ा। 82.
 
That is why that extremely brilliant son became famous by the name 'Kartikeya'. Being born from the coagulated (ejaculated) semen of Shiva, he was named 'Skanda' and because he resided in the cave of the mountain, he was called 'Guh'. 82.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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