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mahabharat 13.87.80: अग्नि के अंश से उत्पन्न हुई गंगाजी की वह महिमामयी योनि, सरकण्डों के दिव्य वन में पहुँचकर बढ़ने लगी और अद्भुत दिखाई देने लगी ॥80॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  13.87.80 
स तु गर्भो महातेजा गांगेय: पावकोद्भव:।
दिव्यं शरवणं प्राप्य ववृधेऽद्भुतदर्शन:॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
अग्नि के अंश से उत्पन्न हुई गंगाजी की वह महिमामयी योनि, सरकण्डों के दिव्य वन में पहुँचकर बढ़ने लगी और अद्भुत दिखाई देने लगी ॥80॥
 
That glorious womb of Ganga, born from a portion of the fire, reached the divine forest of reeds and began to grow and appear wonderful. ॥ 80॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)