Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.87.78-79: इन सब कर्मों और गुणों के कारण ही देवता और ऋषिगण संसार में अग्नि को हिरण्यरेता नाम से पुकारते हैं। उस समय अग्निजन्य मृग (वसु) को धारण करने के कारण पृथ्वी देवी वसुमती नाम से प्रसिद्ध हुईं। | mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
एतै: कर्मगुणैर्लोके नामाग्ने: परिगीयते॥ ७८॥
हिरण्यरेता इति वै ऋषिभिर्विबुधैस्तथा।
पृथिवी च तदा देवी ख्याता वसुमतीति वै॥ ७९॥
अनुवाद
इन सब कर्मों और गुणों के कारण ही देवता और ऋषिगण संसार में अग्नि को हिरण्यरेता नाम से पुकारते हैं। उस समय अग्निजन्य मृग (वसु) को धारण करने के कारण पृथ्वी देवी वसुमती नाम से प्रसिद्ध हुईं।
Because of all these deeds and qualities, the gods and sages call Agni in the world by the name of Hiranyareta. At that time, due to wearing the fire-born deer (Vasu), the earth goddess became famous by the name Vasumati.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥