श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  13.87.67 
शक्ता ह्यसि महीं कृत्स्नां वोढुं धारयितुं तथा।
न हि ते किंचिदप्राप्यमन्यतो धारणादृते॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
देवी! आप तो सम्पूर्ण पृथ्वी को धारण करने में समर्थ हैं, फिर इस बालक को जन्म देना आपके लिए कोई असम्भव कार्य नहीं है।'
 
‘Goddess! You are capable of bearing the entire earth, then bearing this child is not an impossible task for you.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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