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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध
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श्लोक 66
श्लोक
13.87.66
तामुवाच ततो वह्निर्धार्यतां धार्यतामिति।
गर्भो मत्तेजसा युक्तो महागुणफलोदय:॥ ६६॥
अनुवाद
तब अग्नि ने गंगाजी से कहा - देवि ! यह गर्भ मेरे तेज से परिपूर्ण है और इसमें से महान गुणों वाला एक फल निकलेगा। इसे धारण करो, धारण करो ॥66॥
Then Agni said to Gangaji – Goddess! This womb is filled with my radiance and from it will emerge a fruit with great qualities. Hold it, hold it. 66॥
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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