श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  13.87.65 
यदत्र गुणसम्पन्नमितरद् वा हुताशन।
त्वय्येव तदहं मन्ये धर्माधर्मौ च केवलौ॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
हुताशन! इस कार्य में यदि कोई गुण-दोष है, अथवा केवल धर्म है या अधर्म है, तो उन सबका उत्तरदायित्व तुम्हारा है, ऐसा मेरा विश्वास है।॥65॥
 
Hutaashan! If there are any merits or demerits in this work, or if there is only dharma (righteousness) or adharma (irreligion), the responsibility for all of them is on you, I believe.'॥ 65॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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