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mahabharat 13.87.64: देवा! विभावसो! महाद्युते! इस तेज से मेरा कोई संबंध नहीं है। इस समय जो अति सूक्ष्म संबंध स्थापित हुआ है, वह भी देवताओं पर आई हुई विपत्ति के निवारण के लिए ही है। 64।   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  13.87.64 
न तेजसोऽस्ति संस्पर्शो मम देव विभावसो।
आपदर्थे हि सम्बन्ध: सुसूक्ष्मोऽपि महाद्युते॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
देवा! विभावसो! महाद्युते! इस तेज से मेरा कोई संबंध नहीं है। इस समय जो अति सूक्ष्म संबंध स्थापित हुआ है, वह भी देवताओं पर आई हुई विपत्ति के निवारण के लिए ही है। 64।
 
Deva! Vibhavaso! Mahadyute! I have no contact with this brilliance. The very subtle relation that has been established at this time is also for the purpose of averting the calamity that has befallen the gods. 64.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)