श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  13.87.62 
विमूढास्मि कृतानेन न मे स्वास्थ्यं यथा पुरा।
विह्वला चास्मि भगवंश्चेतो नष्टं च मेऽनघ॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
हे निरपराध अग्निदेव! इससे मैं लगभग अचेत हो गया हूँ। मेरा स्वास्थ्य अब पहले जैसा नहीं रहा। भगवन्! मैं बहुत भयभीत हूँ। मेरी चेतना लुप्त होती जा रही है।॥ 62॥
 
‘Innocent Agnidev! This has made me almost unconscious. My health is no longer the same as before. Bhagwan! I am very scared. My consciousness is fading away.॥ 62॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd