श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  13.87.6 
स हि नैव स्म देवानां नासुराणां न रक्षसाम्।
वध्य: स्यामिति जग्राह वरं त्वत्त: पितामह॥ ६॥
 
 
अनुवाद
पितामह! इसे आपसे यह वरदान प्राप्त है कि यह देवता, दानव और राक्षस किसी के द्वारा भी न मारा जाए॥6॥
 
Grandfather! He has obtained this boon from you that he should not be killed by any of the gods, demons and devils. ॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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