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mahabharat 13.87.56: वहाँ उनकी भेंट गंगाजी से हुई। उस समय भगवान शंकर के उस तेज को गंगाजी ने गर्भ के रूप में धारण किया। जैसे सूखे भूसे या लकड़ी के ढेर में रखी अग्नि प्रज्वलित होने लगती है, उसी प्रकार वह तेजोमय गर्भ गंगाजी के भीतर विकसित होने लगा।   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  13.87.56 
तया चाप्यभवन्मिश्रो गर्भं चास्यादधे तदा।
ववृधे स तदा गर्भ: कक्षे कृष्णगतिर्यथा॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
वहाँ उनकी भेंट गंगाजी से हुई। उस समय भगवान शंकर के उस तेज को गंगाजी ने गर्भ के रूप में धारण किया। जैसे सूखे भूसे या लकड़ी के ढेर में रखी अग्नि प्रज्वलित होने लगती है, उसी प्रकार वह तेजोमय गर्भ गंगाजी के भीतर विकसित होने लगा।
 
There they met Gangaji. At that time Gangaji conceived that brilliance of Lord Shankar in the form of a womb. Just like a fire kept in a heap of dry straw or wood starts blazing, in the same way that brilliant womb started growing inside Gangaji.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)