श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  13.87.55 
इत्युक्त: स तथेत्युक्त्वा भगवान‍् हव्यवाहन:।
जगामाथ दुराधर्षो गङ्गां भागीरथीं प्रति॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
देवताओं के ऐसा कहने पर भगवान दुर्धर्ष ‘तथास्तु’ कहकर वायुयान भागीरथी पर सवार होकर गंगा नदी के तट पर चले गए ॥55॥
 
On this being said by the gods, saying 'Tathaastu', Lord Durdharsha went to the banks of river Ganga in the air vehicle Bhagirathi. 55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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