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mahabharat 13.87.53: हे प्रभु! हव्यवाहन! आप ऐसा तेजस्वी और वीर पुत्र उत्पन्न करें जो उस राक्षस से हमारा भय नष्ट कर दे॥ 53॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  13.87.53 
अपत्यं तेजसा युक्तं प्रवीरं जनय प्रभो।
यद् भयं नोऽसुरात् तस्मान्नाशयेद्धव्यवाहन॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! हव्यवाहन! आप ऐसा तेजस्वी और वीर पुत्र उत्पन्न करें जो उस राक्षस से हमारा भय नष्ट कर दे॥ 53॥
 
O Lord! Havyavaahan! Please create such a radiant and heroic son who can destroy the fear we have from that demon. ॥ 53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)