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mahabharat 13.87.51: देवताओं ने कहा - हे अग्निदेव! ब्रह्माजी के वरदान से मदोन्मत्त होकर तारक नाम का एक दैत्य अपने पराक्रम से हम सबको कष्ट दे रहा है। अतः आप उसके वध का उपाय कीजिए॥51॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  13.87.51 
देवा ऊचु:
असुरस्तारको नाम ब्रह्मणो वरदर्पित:।
अस्मान् प्रबाधते वीर्याद् वधस्तस्य विधीयताम्॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
देवताओं ने कहा - हे अग्निदेव! ब्रह्माजी के वरदान से मदोन्मत्त होकर तारक नाम का एक दैत्य अपने पराक्रम से हम सबको कष्ट दे रहा है। अतः आप उसके वध का उपाय कीजिए॥51॥
 
The gods said - O Agnidev! There is a demon named Tarak who is intoxicated by the boon of Brahmaji and is troubling all of us with his prowess. So you should find a way to kill him. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)