श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  13.87.5 
देवा ऊचु:
वरदानाद् भगवतो दैतेयो बलगर्वित:।
देवैर्न शक्यते हन्तुं स कथं प्रशमं व्रजेत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
देवताओं ने कहा - हे प्रभु! आपके वरदान के कारण उस दैत्य को अपने बल का अभिमान हो गया है। देवता उसे मार नहीं सकते। ऐसी दशा में उसे कैसे शांत किया जा सकता है?॥5॥
 
The gods said - O Lord! Because of your boon, that demon has become proud of his power. The gods cannot kill him. How can he be pacified in such a condition?॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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