| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध » श्लोक 43h |
|
| | | | श्लोक 13.87.43h  | | बालस्येव प्रवृद्धस्य कलमव्यक्तमद्भुतम्। | | | | | | अनुवाद | | जैसे वृद्ध पुरुष को विचित्र, बाल-वाणी बहुत मधुर लगती है, जिसे वह समझ नहीं सकता, उसी प्रकार तुम्हारी वाणी भी सबको प्रिय लगेगी।॥42 1/2॥ | | | | ‘Just as an old person finds the strange, childish speech very sweet, which he cannot understand, in the same way your speech will also be liked by everyone.’॥ 42 1/2॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|