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mahabharat 13.87.43-44: ऐसा कहकर और शमीवृक्षके गर्भमें अग्निदेवको देखकर देवताओंने समस्त कर्मोंके लिये शमीको अग्निका पवित्र स्थान घोषित किया। तबसे शमीवृक्षके अन्दर अग्निदेव दिखाई देने लगे ॥43-44॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 43-44
 
 
श्लोक  13.87.43-44 
इत्युक्त्वा तं शमीगर्भे वह्निमालक्ष्य देवता:॥ ४३॥
तदेवायतनं चक्रु: पुण्यं सर्वक्रियास्वपि।
तत: प्रभृति चाप्यग्नि: शमीगर्भेषु दृश्यते॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर और शमीवृक्षके गर्भमें अग्निदेवको देखकर देवताओंने समस्त कर्मोंके लिये शमीको अग्निका पवित्र स्थान घोषित किया। तबसे शमीवृक्षके अन्दर अग्निदेव दिखाई देने लगे ॥43-44॥
 
Having said this and having seen Agnidev in the womb of Shami tree, the Gods designated Shami as the holy place of Agni for all rituals. Since then Agnidev started being visible inside Shami tree. ॥ 43-44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)