Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.87.41-42: अग्निदेव ने अपनी जीभ भी टेढ़ी कर ली। अब अग्निदेव को साक्षात देखकर देवताओं ने करुणापूर्वक शुक से कहा - 'तोते के रूप में रहते हुए तुम पूर्णतः मूक नहीं होगे - थोड़ा-बहुत बोल सकोगे। जीभ टेढ़ी होने पर भी तुम्हारी वाणी अत्यंत मधुर और मनोहर होगी।' | mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अग्निदेव ने अपनी जीभ भी टेढ़ी कर ली। अब अग्निदेव को साक्षात देखकर देवताओं ने करुणापूर्वक शुक से कहा - 'तोते के रूप में रहते हुए तुम पूर्णतः मूक नहीं होगे - थोड़ा-बहुत बोल सकोगे। जीभ टेढ़ी होने पर भी तुम्हारी वाणी अत्यंत मधुर और मनोहर होगी।'
Agnidev twisted his tongue too. Now seeing Agnidev in person, the gods said to Shuka with compassion - 'You will not be completely speechless while being in the form of a parrot - you will be able to speak a little. Even after your tongue is twisted, your speech will be very sweet and graceful.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥