श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  13.87.39 
इत्युक्त्वा पुनरेवाग्निमनुसस्रुर्दिवौकस:।
अश्वत्थान्नि:सृतश्चाग्नि: शमीगर्भमुपाविशत्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर देवता पुनः अग्निदेव के पीछे चले गए। उधर अग्निदेव अश्वत्थ से निकलकर शमी के अन्दर बैठ गए।
 
Saying this, the gods again followed Agni. On the other hand, Agnidev came out of Ashwattha and sat inside Shami. 39.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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