श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  13.87.38 
देवा ऊचु:
प्रतीपया जिह्वयापि सर्वाहारं करिष्यथ।
वाचं चोच्चारयिष्यध्वमुच्चैरव्यञ्जिताक्षराम्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
देवताओं ने कहा - हे हाथियों! तुम अपनी उलटी जीभ से सब प्रकार के अन्न खा सकोगे और जोर से बोल सकोगे; परन्तु उससे कोई अक्षर नहीं निकलेगा ॥38॥
 
The gods said - O elephants! You will be able to eat all kinds of food with your inverted tongue and speak loudly; but it will not produce any syllable. ॥ 38॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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