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mahabharat 13.87.37: हे प्रभु! भृगुकुलश्रेष्ठ! फिर, कृपा करके सुनिए कि किस प्रकार महाबली देवताओं ने नागों पर कृपा की॥37॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  13.87.37 
अनुग्रहं तु नागानां यं चक्रु: शृणु तं प्रभो।
देवा भृगुकुलश्रेष्ठ प्रीत्या सत्यपराक्रमा:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! भृगुकुलश्रेष्ठ! फिर, कृपा करके सुनिए कि किस प्रकार महाबली देवताओं ने नागों पर कृपा की॥37॥
 
Lord! Bhrigukulshreshtha! Then, please listen to the manner in which the mighty Gods showed their grace to the serpents. 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)